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ई20 एक व्यवहारिक ईंधन, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका : डॉ. माशेलकर

ई20 एक व्यवहारिक ईंधन, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका : डॉ. माशेलकर

ई20 एक व्यवहारिक ईंधन, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका : डॉ. माशेलकर नई दिल्ली, 14 जुलाई। भारत के एथेनॉल-मिश्रित ई20 पेट्रोल प्रोग्राम का समर्थन करते हुए पद्म विभूषण से सम्मानित दिग्गज वैज्ञानिक डॉ. रघुनाथ अनंत माशेलकर ने मंगलवार को कहा कि एथेनॉल वैश्विक स्तर पर पहले ही एक व्यवहारिक परिवहन ईंधन साबित हो चुका है और यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है।


बातचीत में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के पूर्व महानिदेशक डॉ. माशेलकर ने एथेनॉल से चलने वाले वाहनों के मामले में ब्राजील के कई दशकों के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि यह ईंधन पूरी तरह व्यवहारिक है।


उन्होंने कहा, "ब्राजील में पिछले 30-40 वर्षों से वाहन एथेनॉल पर चल रहे हैं। यह अनुभव बताता है कि एथेनॉल एक व्यवहारिक ईंधन है।"


रॉयल सोसाइटी के फेलो और केमिकल इंजीनियर डॉ. माशेलकर ने कहा कि एथेनॉल और अन्य स्वदेशी ईंधनों के उपयोग का विस्तार करने से भारत कच्चे तेल के आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।


पश्चिम एशिया में हालिया भू-राजनीतिक तनाव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आने वाली बाधाएं इस बात का संकेत हैं कि भारत को घरेलू स्तर पर उत्पादित वैकल्पिक ईंधनों को तेजी से अपनाना चाहिए।


उन्होंने कहा, हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। हमें अपना ईंधन खुद तैयार करना चाहिए। आयातित ऊर्जा पर निर्भरता किसी भी देश को वैश्विक संघर्षों और आपूर्ति में व्यवधान जैसी परिस्थितियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है।


एथेनॉल का मजबूत समर्थन करते हुए भी डॉ. माशेलकर ने कहा कि भारत को साथ-साथ अन्य स्वच्छ ईंधन विकल्पों पर भी काम करना चाहिए। इनमें मेथेनॉल, डाइमेथाइल ईथर (डीएमई), कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) और बायोमास आधारित ग्रीन हाइड्रोजन शामिल हैं।


उन्होंने कहा, "मैं केवल एथेनॉल की बात नहीं कर रहा हूं। हमें इन सभी वैकल्पिक ईंधनों पर ध्यान देना होगा।"


उन्होंने आगे कहा कि भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में बायोमास को प्रमुख फीडस्टॉक बनाया जाना चाहिए।


उन्होंने कहा, "सूरज की ऊर्जा से ही बायोमास का उत्पादन होता है। इस कारण बायोमास हमारा प्रमुख फीडस्टॉक होना चाहिए, जिससे हम विभिन्न प्रकार के ईंधन तैयार कर सकें।"


डॉ. माशेलकर ने कहा कि बंजर और अर्ध-बंजर भूमि का उपयोग नेपियर घास जैसी ऊर्जा फसलों की खेती के लिए किया जा सकता है। इससे सीबीजी और ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन संभव होगा, जबकि खाद्यान्न उत्पादन के लिए उपयोग होने वाली कृषि भूमि पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Amanat Arora | July 14, 2026 | Technology | Business


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